मुकुल शिवपुत्र : हाल मुकाम कहीं नहीं।

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By TNM Editor December 27, 2016 12:22 Updated

मुकुल शिवपुत्र : हाल मुकाम कहीं नहीं।

नवीन रांगियाल के ब्लॉग से
http://aughatghat.blogspot.in/
ठुमरी सुनी। ख़याल भी। इंदौर और देवास में स्टेज के सामने दरी पर बैठकर घण्टों सुना और जी भर के देखा भी उन्हें। लेकिन इन आयोजनों के दीगर कभी पकड़ में नहीं आए। बहुत ढूंढा। जुगत लगाई कि भजन खत्म होते ही पीछे के रास्ते से जाकर पकड़ लूंगा, लेकिन ग्रीन रूम के दरवाजे से निकलकर पता नहीं कब और कहाँ अदृश्य हो जाते थे। अक्सर यही हुआ। भजन गाकर निकलते ही या तो लोगों ने घेर लिया या अचानक से कहीं गायब हो जाते।
कई महीनों बाद एक दिन पता चला कि होशंगाबाद में रेलवे स्टेशन के आसपास घूमते नज़र आए हैं। सफ़ेद मैली धोती- कुर्ता पहने और गमछा डाले। निर्गुण पंडित कुमार गंधर्व के बेटे मुकुल शिवपुत्र। अधपकी दाढ़ी। तानपुरा कहीं दूर रखा है, जो बेहोशी में भी उनकी नज़र के घेरे में है। कोई कहता बीमार हो गए हैं- किसी ने कहा लड़खड़ा रहे हैं। पैर पर नहीं खड़े हो पा रहे हैं। मन हुआ कि चले जाऊं, लेकिन हिम्मत नहीं हो सकी- यह तय था कि जब तक इंदौर से होशंगाबाद पहुचेंगे, वे अदृश्य हो चुके होंगे। मामला उस दिन वहीँ दफा कर दिया। अच्छा भी हुआ- नहीं गए, अगर जाते तो संगत तो दूर रियाज़ भी कानों में नहीं पड़ता। अगले दिन खबर में थे कि भोपाल वालों ने उन्हें उठा लिया है। भोपाल में ख़याल केंद्र खोलेंगे और वहीँ रखेंगे। यह भी सिर्फ एक ख़याल ही रह गया।
फिर किसी दिन पता चला कि नेमावर में है नर्मदा किनारे। किसी बाबा की कुटिया में धुनि रमा रहे हैं। वहीं डेरा जमाया है। रात के अँधेरे में गौशाला के बाजू में बैठेते हैं। वहीं अँधेरे में भांग घिसते- घोटते हैं और कभी- कभार मन होता है तो गा भी लेते हैं। घाट से सटी उस कुटिया से तानपुरे और आलाप की हल्की खरज नर्मदा किनारों से टकराती है। किनारों के साम- सूम अंधेरे और नदी का संवलाई उजारा पंडित जी के उस रियाज का अभी भी गवाह होगा। शायद उस समय उन्होंने कुछ देर के लिए ही सही, नर्मदा किनारे अपना गाम बसाया हो।
फिर एक दिन भनक लगी कि हमारे पिंड इंदौर में ही हैं। एक अखाड़े में रह रहे हैं। उस दिन भी खूब ढूंढ़ा। पता लगाया कि कौनसा अखाड़ा है। किस मोहल्ले में हैं, किस उस्ताद को अपना चेला बना रहे हैं। कुछ नाम सुनने में आए- कल्लन गुरु व्यायामशाला। सुदामा कुटी व्यायामशाला या बृजलाल उस्ताद व्यायामशाला। इनमे से वे कहीं नहीं थे। दो- तीन दिन बाद पुख्ता सबूत मिले कि बड़ा गणपति के आगे पंचकुईया आश्रम में हैं। यहीं दाल बाटी खा रहे हैं। हनुमानजी के मंदिर के सामने। पंचकुईया अपने घर से दूर नहीं था। करीब पांच- छह किलोमीटर की दूरी पर बस। गाड़ी उठाकर निकल गए। बगैर देर किए चप्पल पहनकर। शाम का धुंधलका छा गया था। इंदौर का धुआं और धूल आदमी को फ़क़ीर बना देती है। घर से चप्पल पहनकर निकल जाओ तो खैरात में मिलने वाली इंदौर की धुंध-धूल से आदमी खुद को आधा कबीर महसूस करने लगता है। शाम साढ़े सात बजे पंचकुईया पहुँचे तो आरती की ध्वनि थी। घी के फाहों में भींजे दीयों में आग महक रही थी। सफ़ेद और भगवा धोती में अध् भींजे पुजारी स्तुति गान में थे। संध्या आरती और हनुमान चालीसा के पाठ की करतल ध्वनियां। अपना मन नहीं था लेकिन स्तुति में। फिर भी आरती खत्म होने तक इंतज़ार करना पड़ा। बीच- बीच में यहां- वहां देखते रहे। ताली बजाते हुए इधर- उधर नज़र फेरते रहे। किसी कुटी में कहीं नज़र आ जाए शिवपुत्र। कहीं से रियाज की या किसी आलाप की आवाज आ जाए। लेकिन सूना ही नज़र आया आश्रम। आरती खत्म होते ही पूछा किसी से- जवाब मिला जानकी महाराज से पूछ लो, उनको पता होगा। जानकी महाराज को ढूंढा तो वो अपने गमछे धो रहे थे। गमछों से उनके पानी झारने और सुखाने तक उनका इंतज़ार किया। फटका मारकर अपने कमरे से बाहर आए तो उनसे पूछा- पंडितजी कहाँ बैठे हैं। उन्होंने बताया कलाकार आए तो थे, लेकिन दोपहर में चले गए। दिल बैठ गया। हमने तस्दीक करने के लिए फिर पूछा- आप जानते हैं ना मैं किनके बारे में पूछ रहा हूँ – जवाब था, हां ! महाराज, शिवपुत्र आए थे, लेकिन चले गए। एक गाड़ी आई थी बैठकर चले गए। दो दिन यहीं भांग खाई, भजन गाये और आटा भी गूंथा। मैं समझ गया कि पंडितजी चले गए यहाँ से भी। थोड़ी- थोड़ी बदरंगी और बेरुखी के साथ लौट आए।
यह पंडितजी की ठुमरी और उनकी ख्याल गायकी से दीगर उनकी कबीरियत की संगत और उसे जानने के करतब थे, जो कभी कामयाब नहीं हुए। मौसिकी से परे उनकी बेफिक्री से हर किसी का राब्ता रहा है। मेरा कुछ ज़्यादा ही। बीच में एक सुर का अदृश्य तार तो जुड़ा ही रहा हमेशा, लेकिन संगत अब तक नहीं हो पाई। रियाज और आलाप तो बहुत दूर है। इसी बीच मुम्बई से कुछ फिल्म मेकर भी आये थे- वो पंडितजी पर डॉक्युमेंट्री बनाना चाह रहे थे। इस बहाने भी हमने उनको खूब खोजा-पूछा। देवास टेकरी पर ‘माताजी के रास्ते’ पर भी पूछा-ताछा। उनकी खोज में मुंबई वालों की मदद करने का मन कम और अपनी मुराद पूरी करने का इरादा ज्यादा था- इसलिए नेमावर से लेकर दिल्ली तक फोन लगाए, भोपाल भी पूछा, लेकिन कुछ नहीं हो सका।
फिलहाल मैं नागपुर में हूँ- उनका सुना है कि वे पुणे में हैं, लेकिन हमें अपने प्रारब्ध पर यकीन कुछ कम ही है – इसलिए वहां पुणे भी नहीं जा रहे। क्या पता वहां से भी भांग दबाकर कहीं रफूचक्कर हो जाए पंडित जी।
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